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एक माह भी नहीं टिके सुरक्षा इंतजाम, पीडब्ल्यूडी की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल;

जनप्रतिनिधियों की आवाजाही के बावजूद समस्या जस की तस।

संवाददाता धर्मेंद्र राजपूत की रिपोर्ट

फर्रुखाबाद। अमृतपुर थाना क्षेत्र के राजपुर-गुडेरा संपर्क मार्ग स्थित चपरा पुलिया एक बार फिर सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सवालों के घेरे में है। करीब एक माह पहले पुलिया के किनारे हादसों से बचाव के लिए लगाए गए सुरक्षा पिलर अब जगह-जगह टूटकर गायब हो चुके हैं। ऐसे में पुलिया से गुजरने वाले राहगीरों और वाहन चालकों पर हादसे का खतरा मंडरा रहा है।
ग्रामीणों का आरोप है कि सुरक्षा के नाम पर लगाए गए पिलरों की गुणवत्ता इतनी कमजोर थी कि वे एक माह भी मजबूती से नहीं टिक सके। पुलिया पहले से ही हादसों के लिहाज से संवेदनशील मानी जाती है। ग्रामीणों के मुताबिक यहां पूर्व में कई लोग दुर्घटनाओं का शिकार हो चुके हैं, इसके बावजूद स्थायी और मजबूत सुरक्षा व्यवस्था नहीं की गई।सुरक्षा के नाम पर खानापूर्ति का आरोप
ग्रामीणों का कहना है कि पुलिया पर मजबूत रेलिंग और टिकाऊ सुरक्षा पिलर लगाए जाने की जरूरत है, लेकिन विभाग द्वारा किए गए इंतजाम महज खानापूर्ति साबित हो रहे हैं। पिलर टूटने के बाद पुलिया के किनारे सुरक्षा व्यवस्था और भी कमजोर हो गई है। ग्रामीणों ने सवाल उठाया कि जब लगाए गए पिलर कुछ ही समय में टूट गए तो निर्माण की गुणवत्ता की जांच आखिर किसने की?
जनप्रतिनिधि गुजरते रहे, समस्या नहीं दिखीराजपुर-गुडेरा मार्ग से क्षेत्रीय लोगों के साथ-साथ जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों का भी आवागमन होता रहता है। ग्रामीणों का कहना है कि इसके बावजूद चपरा पुलिया की बदहाल सुरक्षा व्यवस्था पर किसी का ध्यान नहीं गया। ग्रामीणों ने सांसद मुकेश राजपूत और विधायक सुशील शाक्य से मामले का संज्ञान लेकर पुलिया का स्थलीय निरीक्षण कराने की मांग की है।
बड़े हादसे के बाद जागेंगे जिम्मेदार?
ग्रामीणों का कहना है कि पुलिया पर सुरक्षा इंतजाम मजबूत नहीं किए गए तो किसी दिन बड़ा हादसा हो सकता है। उनका सवाल है कि आखिर जिम्मेदार विभाग किसी दुर्घटना का इंतजार क्यों कर रहा है? ग्रामीणों ने पीडब्ल्यूडी विभाग से टूटे पिलरों को तत्काल हटाकर मजबूत सुरक्षा रेलिंग व पिलर लगवाने और निर्माण की गुणवत्ता की जांच कराने की मांग की है।अब देखना यह है कि पीडब्ल्यूडी विभाग और जिम्मेदार जनप्रतिनिधि चपरा पुलिया की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर कब गंभीर होते हैं, या फिर किसी बड़े हादसे के बाद ही जिम्मेदारों की नींद खुलेगी।

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